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Wednesday, 26 January 2011

संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है।

संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है।


 

क्या पत्रकार को यह वैधानिक अधिकार है कि वह स्वयं अपने प्रमाणों के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करा सके (भले ही अपराध से प्रभावित व्यक्ति स्वयं आगे आने से मना कर दें)?


उत्तर - - - 


 
हम नहीं जानते कि आप पत्रकार हैं या नहीं। लेकिन किसी भी पत्रकार को किसी भी अपराध के मामले में कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। पत्रकारों को भी वे ही अधिकार हैं जो कि सामान्य नागरिकों को प्राप्त हैं। भारतीय दंड संहिता में अपराधों को संज्ञेय औऱ असंज्ञेय अपराधों की दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह संज्ञेय अपराध की सूचना प्राप्त होने पर उसे लेखबद्ध करे और सूचना देने वाले को पढ़ कर सुनाए और उस पर सूचना देने वाले के हस्ताक्षर करवाए तथा इस सूचना का सार प्रथम सूचना रिपोर्ट की पुस्तक में दर्ज करे। इस तरह पंजीकृत की गई सूचना की एक प्रतिलिपि तुरंत सूचना देने वाले व्यक्ति को निशुल्क प्रदान करे। यदि किसी भी पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी इस तरह की सूचना को पंजीकृत करने से इन्कार करता है तो वह व्यक्ति ऐसी सूचना को डाक द्वारा लिखित में पुलिस अधीक्षक को प्रेषित कर सकता है। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझता है कि सूचना में वर्णित अपराध घटित हुआ है तो वह वह स्वयं मामले का अन्वेषण करेगा या अपने किसी अधीनस्थ अधिकारी को ऐसा अन्वेषण करने को निर्देशित करेगा।
इस तरह संज्ञेय अपराधों के मामले में कोई भी व्यक्ति चाहे वह भारत का नागरिक हो या नहीं पुलिस को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। इस के लिए यह भी आवश्यक नहीं है कि उस व्यक्ति के पास कोई प्रमाण है अथवा नहीं है। यदि प्रमाण हैं तो वे प्रमाण भी वह पुलिस को दे सकता है, जिन का उपयोग पुलिस अन्वेषण में कर सकती है। संज्ञेय अपराध के सम्बंध में यह आवश्यक नहीं है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने वाला व्यक्ति स्वयं उस अपराध से पीड़ित है अथवा नहीं। 
 

क्या न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल करने की कोई समय सीमा होती है?

क्या न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल करने की कोई समय सीमा होती है?




क्या आरोप पत्र (चालान ) दाखिल करने की कोई समय सीमा भी होती है, या नहीं?  अगर होती है, तब कितनी होती है? और क्या कोई ऐसी विशेष धारा भी होती है.जिसमें समय सीमा का कोई मापदंड नहीं होता है आरोप पत्र दाखिल करने का? इसके अतिरिक्त धारा  498-ए  व 406  में यह कितने दिनों की समय सीमा निर्धारित है।

 उत्तर - - - 


सभी अपराधों का विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार होता है। इस संहिता में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है। लेकिन इस में न्यायालय द्वारा किसी अभियुक्त के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिए जाने के लिए समय सीमा निर्धारित की गई है। इस संहिता का अध्याय 36 इसी मामले में है।  धारा 468 में परिसीमा निर्धारित की गई है। इस के अनुसार .....
1. यदि कोई मामला केवल जुर्माने से दंडनीय है तो उस की समय सीमा छह माह है;
2. यदि कोई मामला एक वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास से दंडनीय है तो समय सीमा एक वर्ष है;
3. यदि कोई मामला तीन वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास से दंडनीय है तो समय सीमा तीन वर्ष है: तथा
4. यदि कोई मामला तीन वर्ष से अधिक अवधि के कारावास से दंडनीय है तो उस के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।
यह समय सीमा अपराध की तिथि से आरंभ होती है जहाँ अपराध की जानकारी व्यथित व्यक्ति को या पुलिस अधिकारी को नहीं है वहाँ समय सीमा उस दिन से आरंभ होती है जिस दिन अपराध किए जाने की सूचना इन में से किसी को प्राप्त होती है। जहाँ यह ज्ञात नहीं है कि अपराध किसने किया है वहाँ समय सीमा तब प्रारंभ होगी जब व्यथित व्यक्ति अथवा पुलिस अधिकारी को पता लगता है कि अपराध किसने किया है। इस मामले में अवधि की गणना के लिए वह दिन छोड़ दिया जाता है जिस दिन इस की गणना की जानी है।
लेकिन कुछ अपराध हैं जो लगातार चालू रहते हैं, ऐसे मामलों में समय सीमा प्रत्येक उस क्षण से लागू होगी जिस के दौरान अपराध चालू रहता है। इन बातों के होते हुए भी यदि न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि देरी का उचित स्पष्टीकरण है तो न्याय हित में न्यायालय अपराध का संज्ञान ले सकता है। 
धारा 498-ए तथा धारा 406 भा.दं.सं.में अधिकतम दंड तीन वर्ष का कारावास है इस कारण से इस मामले में क्रूरता किए जाने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के अंतर्गत न्यायालय मामले का प्रसंज्ञान ले सकता है। लेकिन इन मामलों में कभी कभी अपराध लगातार चालू रहने वाला होता है। ऐसी स्थिति में  जिस  तिथि तक अपराध चालू रहता है उस से तीन वर्ष की अवधि के भीतर न्यायालय द्वारा इन अपराधों का प्रसंज्ञान लिया जा सकता है।  
एक बात और है जो इस परिसीमा के संदर्भ में यहाँ उल्लखित की जा सकती है। कुछ मामलों में अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया जाता है। लेकिन पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जाता है। सामान्यतः ऐसे मामलों में आरोप पत्र प्रस्तुत करने की समय सीमा गिरफ्तारी के दिन से 90 दिन की है। यदि इस अवधि में पुलिस द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जाता है तो अभियुक्त को जमानत पर छूटने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। कुछ विशिष्ठ मामलों में पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने के लिए 180 दिनों की छूट दी गई है। यदि इन विशिष्ठ मामलों में पुलिस 180 दिन तक आरोप पत्र प्रस्तुत न करे तो अभियुक्त को जमानत पर छूटने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। लेकिन इस से मुकदमा समाप्त नहीं होता।

Monday, 24 January 2011

अपने वकील से संतुष्ट नहीं हैं तो तुरंत किसी वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करें


 प्रश्न
 पति-पत्नी में तलाक के मुकदमे को चलते दो साल हो गए हैं, पति तलाक चाहता है और पत्नी नहीं चाहती और वे दोनों दो साल से अलग रह रहे हैं। क्या उन का तलाक हो सकता है?

उत्तर--

 
आप का प्रश्न स्पष्ट नहीं है। आप के प्रश्न से यह तो पता लगता है कि तलाक का मुकदमा अवश्य ही पति ने किया है,  क्यों कि पत्नी तो तलाक चाहती ही नहीं है। इस प्रश्न से यह पता नहीं लगता कि पति को तलाक क्यों चाहिए? और उस ने तलाक के लिए जो अर्जी दी है उस का आधार क्या है? केवल इस तथ्य के आधार पर कि मुकदमा चलते दो वर्ष हो गए हैं यह कैसे निश्चित किया जा सकता है कि तलाक हो सकता है अथवा नहीं। आप के प्रश्न से यह भी स्पष्ट नहीं है कि पति-पत्नी के अलग रहने का आधार क्या है। क्या पति ने पत्नी का त्याग किया है अथवा पत्नी ने पति का त्याग किया है। यदि पत्नी स्वयं ही पति को छोड़ कर चली गई है तो उस के पास उस के अलग रहने का उचित कारण होना चाहिए। यदि उस के पास पति को छोड़ कर चले जाने का उचित कारण नहीं है तो फिर उस का इस तरह पतिगृह छोड़ कर चले जाना निश्चित रूप से अनुचित है और दो वर्ष तक पति का पत्नी द्वारा बिना किसी कारण त्याग कर देना तलाक के लिए उचित आधार है। 
पति ने जो तलाक की अर्जी दो वर्ष पहले दी हुई है निश्चित ही उस में पत्नी द्वारा पति का स्वैच्छा से लंबे समय तक त्याग करना एक आधार नहीं रहा होगा। तो पति को एक आवेदन प्रस्तुत कर अपनी तलाक की अर्जी में संशोधन करवा कर इस आधार को जोड़ना होगा तभी इस आधार पर तलाक की डिक्री अदालत द्वारा पारित की जा सकती है।
लेकिन पति को एक बात का ध्यान रखना होगा कि उस के द्वारा तलाक की अर्जी न्यायालय में प्रस्तुत करना भी पति से अलग रहने का एक उचित कारण हो सकता है, यदि इस बीच पत्नी ने न्यायालय में यह नहीं कहा हो कि वह पति के साथ रहने को तैयार है। यदि उस ने अदालत में यह कहा है कि वह पति के साथ रहने तो तैयार है तो यह आधार निष्फल सिद्ध होगा। पति ने न्यायालय में मुकदमा किया हुआ है तो  उस ने वकील की सहायता भी प्राप्त की होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि पति उस के वकील से संतुष्ट नहीं है।यदी ऐसा है तो उसे तुरंत किसी अन्य वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।  

विधिक सेवा प्राधिकरण को आवेदन करें, योग्य होने पर सरकारी खर्च पर वकील मिलेगा

 


1. मेरी पत्नी ने मुझ पर धारा 406 और धारा 498-ए का का झूठा मामला दर्ज कराया है। मैं अपनी बात को कैसे अदालत के सामने रखूँ? मेरे पास वकीलों को देने के लिए पैसे नहीं हैं क्या मुझे जेल में रहना होगा? 
2.क्या कोर्ट मैरिज करने के चार साल बाद दहेज की धारा लगाई जा सकती है? जब कि कभी दहेज की मांग की ही नहीं। 
3.क्या धारा 406, 498-ए में जमानत मिलती ही नहीं है?



उत्तर ---


 
एक तो आपने नाम ऐसा रखा हुआ है कि यदि पुलिस को यह नाम पता लगेगा तो आप से कुछ विशिष्ठ व्यवहार कर सकती है। यह विशिष्ठ व्यवहार आप के लिए लाभदायक भी हो सकता है और हानिकारक भी। वैसे पुलिस का रवैया आप खुद जानते हैं। यदि उन के पास तिल्ली या कोई ऐसा ही दाना उन के पल्ले पड़ जाए तो वे तब तक दबाते हैं जब तक उस से तेल निकलने की संभावना होती है। लेकिन रेत को वे देखते ही पहचान लेते हैं और जानते हैं कि इस से तेल नहीं निकाला जा सकता। फिर वे उस से रेत के दाने जैसे ही व्यवहार करते हैं।
अभी आप का मामला अदालत तक नहीं पहुँचा है, पुलिस तक ही है। पुलिस ने यदि आप को गिरफ्तार कर लिया तो ही वह आप को अदालत में प्रस्तुत करेगी। तब अदालत तक आप का जाना हो सकेगा। लेकिन जब तक आप के विरुद्ध चालान पेश नहीं होता है आप को अदालत से कुछ कहने का अवसर नहीं मिलेगा। इस कारण से जब तक आप को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर लेती है. आप पुलिस के अन्वेषण अधिकारी जिस के पास मामला अन्वेषण के लिए है उस के सामने अपना पक्ष स्पष्ट कर सकते हैं। यदि वह अधिकारी आप की बात सुनने से इन्कार करे तो आप पुलिस के उच्चाधिकारियों को अपनी बात लिख कर दे सकते हैं।
यदि आप यह समझते हैं कि भा.दं.संहिता की धाराएँ 406 और 498-ए केवल दहेज के कारण ही लागू हो सकती हैं तो यह गलत धारणा है। यदि आप अपनी पत्नी के साथ क्रूरता पूर्ण व्यवहार करते हैं तो भी धारा 498-ए लागू होगी। यह क्रूरता मानसिक भी हो सकती है। आप यह न समझें कि यह धारा केवल दहेज के कारण ही प्रभाव में आ सकती है। धारा-406 स्त्री-धन के सम्बंध में है। यदि आप की पत्नी की कोई भी संपत्ति आप के कब्जे में है और आप उसे लौटाने से मना करते हैं या रोक कर रखते हैं तो धारा-406 लागू होगी। आप को चाहिए कि आप अन्वेषण अधिकारी को ऐसी सारी संपत्ति स्वयं ही सौंप दें और उसे सारी बात बताएँ। यह उस के विवेक पर है कि वह क्या करता है? 
यदि आप के पास वकील के लिए पैसा नहीं है तो आप जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष एक आवेदन कीजिए कि आप को कानूनी सहायता चाहिए। यदि आप को योग्य माना गया तो आप को वहाँ से वकील की सुविधा प्राप्त हो जाएगी। जिस की फीस सरकार अदा करेगी।
धारा 406 व 498 ए में जमानत हो जाती है। लेकिन यह अन्वेषण समाप्त हो जाने पर या पुलिस को अन्वेषण के लिए आप की आवश्यकता न रहने पर ही संभव हो सकता है।

क्या एक ही वकील सभी न्यायालयों में मुकदमे में पैरवी नहीं कर सकता?

क्या एक ही वकील सभी न्यायालयों में मुकदमे में पैरवी नहीं कर सकता?


 

क्या किसी भी प्रकार के विवाद के मामले में अपील दायर करने के लिए उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के अलग-अलग वकील करने की आवश्कता होती है और क्या जिला न्यायालय में केस लड़ने वाला वकील ही आगे अपील दायर नहीं कर सकता है? क्या सभी वकीलों को सभी न्यायालय की कोई मेम्बरशिप लेनी होती है तब ही उस कोर्ट में अपील दायर कर सकते हैं? 


  उत्तर - - - 

 
यूँ तो कोई भी वकील जो किसी भी राज्य की बार कौंसिल का सद्स्य है, उन न्यायालयों के अतिरिक्त जहाँ कानून के द्वारा वकीलों को पैरवी करने से प्रतिबंधित किया गया है,* भारत के किसी भी न्यायालय में मुकदमे की पैरवी कर सकता है। लेकिन हर वकील का अभ्यास कुछ ही न्यायालयों तक सीमित होता है। अक्सर जहाँ वह रहता है उसी स्थान के न्यायालयों में काम करता है। आवश्यकता होने पर नजदीक के न्यायालयों में पैरवी करने जाता है। लेकिन यदि आप किसी स्थानीय वकील को उच्चन्यायालय में पैरवी करने को कहें तो वह इस लिए इन्कार करता है कि वहाँ के बहुत से व्यवहार के नियमों की उसे जानकारी और अभ्यास नहीं होता। फिर वहाँ जा कर वह सहज अनुभव नहीं करता। वैसे भी व्यवहारिक यही है कि जिस अदालत में आप को मुकदमा लड़ना है उस अदालत में अक्सर अभ्यासरत वकील को ही मुकदमा दें जिस से वह सहज हो कर अपना काम मुस्तैदी से कर सके। 
उच्चन्यायालय तक के स्तर तक कोई भी वकील मुकदमा प्रस्तुत कर सकता है और पैरवी कर सकता है लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में यह आवश्यक है कि आप के मुकदमे में आप को सर्वोच्च न्यायालय में किसी एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड के रूप में पंजीकृत वकील को ही अपना वकील नियुक्त करना होगा। जिस से वह न्यायालय और आप के बीच एक अच्छा माध्यम बन सके। केवल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड ही वहाँ कोई मुकदमा या कोई भी आवेदन, दस्तावेज, जवाब आदि प्रस्तुत कर सकता है। यहाँ तक कि यदि उसी मुकदमे में आप की ओर से कोई अन्य स्थानीय वकील या सीनियर एडवोकेट भी न्यायालय के समक्ष बहस करने के लिए उपस्थित होने वाला है तो उस की सूचना अदालत को लिखित में आपका एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड ही न्यायालय को देगा। उसी के अनुसार न्यायालय में प्रवेश के लिए पास आदि बनेंगे और सूचित वकील ही सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी कर सकते हैं।